Friday, July 14, 2017

औरतें प्रेम में तैरने से प्यार करती हैं




ऐसा नही था कि
वह रोमांटिक नही थी..
पर दमन भी तो था उतना ही

तुम्हे देख
बह निकली थी अदम्य वेग से
समन्दर को लपकती है जैसे नदी

अब जब विचारणा
मस्तिक से गायब है
कुड़कुड़ाहत बेचैनी शांत है
तुम्हे रख लिया है उसने सम्भालकर
हथेली के छाले की तरह

पता है उसे
प्रेम उसका अर्पित है
सदा-सदा के लिए
अंकुरा गई है फिर भी
उसकी आशाएं,आकांक्षाएं फिर से

बादलों की फुईयों से
गुंजायमान हो उठी हो घाटी जैसे
तुम्हे प्यार करते
वह घाटी के विस्तार को
पार कर चुकी है
गहराई में डूब गई है
दोहराते हुवे प्रेम
उसके पोर-पोर से
किरणों के सदृश्य फूटता है प्रेम

तुम्हे प्यार करते हुवे
पहली बार जाना उसने
औरतें प्रेम में तैरने से प्यार करती हैं
औरतें प्रेम के लिए जीती हैं
औरतें प्रेम के लिए मरती हैं...!

       वसुन्धरा पांडेय